मुझे कुदरत की करनी, साफ़ दिख रही है

बेबसी की तस्वीर, साफ़ दिख रही है लोगों का काला, इतिहास लिख रही है मर रही है इंसानियत कदम दर कदम, बस दिलों में सब के, ख़ाक दिख रही है मज़लूम बचाये कैसे अपनों की ज़िंदगी, इधर दौलत के दम पे, सांस बिक रही है हम बिखरे रिश्तों को कब तक संभालें, अब सभी के दिल में, फांस दिख रही है लुट रहा है आदमी ही आदमी के हाथों, लुटेरों की अब तो, हर ज़ात दिख रही है अब भी वक़्त बाक़ी है सुधर जाओ 'आदि' मुझे कुदरत की करनी, साफ़ दिख रही है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दिनांक:- 28/01/2026 को बलहा घाट - गोढ़ियारी घाट पुल निर्माण : जनआंदोलन, जनअनुशंसा एवं संघर्ष की ऐतिहासिक पहल

दिनांक:-4-5/01/2026 को पुरानानकर बलहा घाट – गोढ़ियारी घाट पुल निर्माण हेतु संयुक्त आभार एवं पुनः आग्रह

(chronological biography) सर्वसाधारण बिहार सरकार भूमि से अतिक्रमण हटाने के न्याय के लिए संघर्ष : एक प्रशासनिक यात्रा